Shri Ram Janm Stuti - Hindi
Shri Ram Janm Stuti - Hindi
भए प्रगट कृपाला
छंद:
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला, कौसल्या हितकारी ।
हरषित महतारी, मुनि मन हारी, अद्भुत रूप बिचारी ॥
अर्थ : "दयालु और कृपालु भगवान प्रकट हो गए, जो दीन-दुखियों पर दया करने वाले और माता कौशल्या के लिए हितकारी हैं। माता कौशल्या हर्ष से भर गईं, और उनके अद्भुत स्वरूप को देखकर ऋषियों के मन भी मोहित हो गए।"
लोचन अभिरामा, तनु घनस्यामा, निज आयुध भुजचारी ।
भूषन बनमाला, नयन बिसाला, सोभासिंधु खरारी ॥
अर्थ : "भगवान श्रीराम के नेत्र अत्यंत आकर्षक हैं, उनका शरीर घने बादलों के समान श्यामवर्ण है। उनकी चारों भुजाओं में उनके अपने शस्त्र (अस्त्र-शस्त्र) शोभायमान हैं। वे वनमाला और सुंदर आभूषण धारण किए हुए हैं, उनकी आंखें बड़ी और विशाल हैं। रावण के शत्रु श्रीराम सुंदरता के सागर हैं।"
कह दुइ कर जोरी, अस्तुति तोरी, केहि बिधि करूं अनंता ।
माया गुन ग्यानातीत अमाना, वेद पुरान भनंता ॥
अर्थ : "मैं दोनों हाथ जोड़कर आपकी स्तुति करता हूँ, हे अनंत प्रभु! लेकिन मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ? आप तो माया, गुण और ज्ञान से परे हैं और किसी भी प्रकार के मान-सम्मान से रहित हैं। वेद और पुराण भी आपकी महिमा का वर्णन करते हैं।"
करुना सुख सागर, सब गुन आगर, जेहि गावहिं श्रुति संता ।
सो मम हित लागी, जन अनुरागी, भयउ प्रगट श्रीकंता ॥
अर्थ : "जो करुणा और आनंद के सागर हैं, जो सभी सद्गुणों के भंडार हैं, जिनकी महिमा वेद और संतगण गाते हैं, वही भगवान श्रीराम, भक्तों के प्रति प्रेम करने वाले, मेरे कल्याण के लिए प्रकट हुए हैं।"
ब्रह्मांड निकाया, निर्मित माया, रोम रोम प्रति बेद कहै ।
मम उर सो बासी, यह उपहासी, सुनत धीर मति थिर न रहै ॥
अर्थ : "ब्रह्मांड के समस्त निकाय (संरचनाएं) आपकी माया से निर्मित हैं, और वेद कहते हैं कि आपके प्रत्येक रोम में अनगिनत ब्रह्मांड स्थित हैं। फिर भी, यदि कोई कहे कि आप मेरे हृदय में निवास करते हैं, तो यह उपहास जैसा लगता है। इसे सुनकर धैर्यवान और स्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति भी विचलित हुए बिना नहीं रह सकते।"
उपजा जब ग्याना, प्रभु मुसुकाना, चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै ।
कहि कथा सुहाई, मातु बुझाई, जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै ॥
अर्थ : "जब माता कौशल्या के हृदय में ज्ञान उत्पन्न हुआ (अर्थात् वे भगवान श्रीराम की वास्तविकता को समझने लगीं), तब प्रभु श्रीराम मुस्कुराए। वे अपने बाल रूप में विविध प्रकार की लीलाएँ करना चाहते थे। अतः उन्होंने सुंदर कथा कहकर माता को समझाया, जिससे वे पुत्र के प्रति प्रेम का अनुभव कर सकें।"
माता पुनि बोली, सो मति डोली, तजहु तात यह रूपा ।
कीजै सिसुलीला, अति प्रियसीला, यह सुख परम अनूपा ॥
अर्थ : "माता कौशल्या फिर बोली, उनकी बुद्धि प्रेमवश डगमगा गई (अर्थात वे भगवान के दिव्य स्वरूप को भूलकर उन्हें अपने पुत्र के रूप में देखने लगीं)। उन्होंने कहा— 'हे तात! (पुत्र) आप यह दिव्य रूप त्याग दें और बालक जैसी लीलाएं करें, क्योंकि यह बाल सुलभ लीलाएं ही अत्यंत प्रिय और अनुपम आनंद देने वाली हैं।"
सुनि बचन सुजाना, रोदन ठाना, होइ बालक सुरभूपा ।
यह चरित जे गावहिं, हरिपद पावहिं, ते न परहिं भवकूपा ॥
अर्थ : "माता के वचन सुनकर, बुद्धिमान प्रभु श्रीराम ने रोने का निश्चय किया और स्वयं को एक बालक के रूप में प्रकट कर दिया, हालांकि वे देवताओं के स्वामी हैं। जो भी भक्त इस दिव्य चरित्र का गान करते हैं, वे भगवान के चरणों की प्राप्ति करते हैं और इस संसार रूपी अंधकारमय कुएं (जन्म-मरण के चक्र) में नहीं गिरते।"
दोहा:
बिप्र धेनु सुर संत हित, लीन्ह मनुज अवतार ।
निज इच्छा निर्मित तनु, माया गुन गो पार ॥
अर्थ : "ब्राह्मणों, गायों, देवताओं और संतों के कल्याण के लिए भगवान ने मानव रूप में अवतार लिया। उनका यह शरीर उनकी अपनी इच्छा से निर्मित है, जो माया, गुण और प्रकृति के प्रभाव से परे है।"